मंगलवार, 28 अक्टूबर 2008

होटल में थिरकेगी कैटरीना


कैटरीना कैफ के सितारे इन दिनों सातवें आसमान पर हैं। “नमस्ते लंदन”, “वेल्कम” “रेस” और “ सिंह इज़ किंग” जैसी हिट फिल्में देने के बाद वे अव्व्ल नम्बर के सितारों की श्रेणी में जा खड़ी हुई हैं। अपनी इस ऊंची छंलाग का भरपूर फायदा उठाने से कैटरीना पीछे नहीं रह रही हैं। खबर है कि वे मुम्बई के पांच सितारा होटल, जे डब्ल्यू मैरियट में 31 दिसम्बर की रात नृत्य प्रदर्शन करेंगी। जाहिर है, इसके लिए उन्हें एक मोटी रकम मिलेगी। याद रहे पिछले साल नव वर्ष की पूर्व संध्या पर इसी होटल में बिपाशा बसु ने नृत्य किया था जबकि उससे पहले वाले साल मल्लिका शेरावत ने यहां ठुमके लगाए थे। देखें इस साल कैटरीना क्या कमाल दिखलाती हैं।

शुक्रवार, 19 सितंबर 2008

आलू-प्याज से भी सस्ती इंसानी जान

फल-सब्जी इधर कई महीने से इतने महंगे हो गए हैं कि इंसानी जान उनके आगे सस्ती पड़ चुकी है। मंडी में आने वाले हर फल व हर सब्जी के ट्रक चालक को बोनस मिलता है, लेकिन इंसानी जान को अपनी जान के भी लाले पड़ जाते हैं। बात चौंकाने वाली जरूर हो सकती है, पर है सच।
कश्मीर से मंडी में पहुंचने की बात हो या हैदराबाद, बंगलुरु, कोलकाता व अहमदाबाद से। दूरी जितनी अधिक होगी, ट्रक चालक को उतना अधिक बोनस मिलता है। जानकारी के अनुसार, आजादपुर मंडी में जल्दी सब्जी व फल पहुंचाने के लिए ट्रक मालिक दो से छह हजार रुपये चालक को ईनाम देते हैं। त्योहारों का महीना हो तो इनाम की राशि और बढ़ा दी जाती है।
इन दिनों रमजान का महीना चल रहा है। ईद व दशहरा का त्योहार भी नजदीक है, लिहाजा ईनाम की राशि तीन से आठ हजार रुपए प्रति ट्रिप बोनस कर दिया गया है।
बोनस की लालच में ट्रक चालक कई जिंदगियों को रौंदने से भी बाज नहीं आते। कोई मरता है तो मरे, कोई जख्मी होता है तो होता रहे, ट्रक चालक को तो अपनी मंजिल पर पहुंचने से मतलब होता है। वह अगर फल-सब्जियों के साथ जल्दी मंडी नहीं पहुंचा तो ईनाम पाने से चूक जाएगा। चालक का यह लालच न जाने अब तक कितनों की जान ले चुका है। जानकार बताते हैं कि 24 घंटे ट्रक चलाने से चालक थक कर चूर हो जाते हैं। थकान मिटाने के लिए चालक नशे का सहारा लेता है। उस नशे में वह इंसानी फर्ज भी भूल जाता है। उसे अगर कुछ याद रहता है तो वह है जल्दी मंडी पहुंचने वाला बोनस। उसे पाने के लिए वह किसी भी दुर्घटना को अंजाम दे सकता है।
सरकार भले ही यह तथ्य न स्वीकार करें, लेकिन मंडी समितियों में बैठे अधिकारी व ट्रैफिक पुलिस इससे भलीभांति अवगत हैं। बावजूद इसके रोड रेस की इस योजना पर लगाम लगाने का कोई प्रयास नहीं किया गया। जबकि दिल्ली ट्रैफिक पुलिस की अगस्त में जारी रिपोर्ट के अनुसार इस वर्ष 10 अगस्त तक ट्रक हादसे में 263 लोगों की मौत हो चुकी है। पिछले साल इन ट्रकों ने 305 लोगों को टक्कर मारकर मौत की नींद सुला दिया था और 675 लोग घायल हुए थे।
जानकारों के अनुसार चालक को टारगेट दिया जाता है कि 40, 50 या 55 घंटे में गाड़ी मंडी में पहुंच जानी चाहिए। यदि निर्धारित समय में चालक मंडी नहीं पहुंचता तो बोनस की रकम आधी हो जाती है। भला कौन चालक ऐसा चाहेगा, इसलिए कोलकाता की करीब1500 किलोमीटर की दूरी चालक चार दिन की जगह 48 घंटे में पूरी कर लेते हैं। इन दिनों कर्नाटक के हसन से मंडी में आलू व हुबली से अन्नानास आ रहा है, जिसे ट्रक चालक पांच दिन के बजाए चौथे दिन ही मंडी में पहुंचा दे रहे हैं। कुछ यही हाल महाराष्ट्र के नासिक व हैदराबाद एवं सेब से लदे शिमला व कश्मीर से आने वाले ट्रकों का भी है।

गुरुवार, 4 सितंबर 2008

दम तोड़ता बचपन



हाथों में बस्ता लेकर पढ़ने के लिए स्कूल जाने की उम्र में उसे नाजुक कंधों पर थाल व हाथ में झाबा लेकर स्कूलों के सामने भेलपुरी बेचना पड़ रहा है। खेलों से उसका दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं है, क्योंकि उसे पता है कि यदि वह खेलों में रुचि लेने लगा, तो जिंदगी के खेल में उसे हार का सामना करना पड़ सकता है।
दस साल का यह बच्चा है लक्ष्मण, जो अपने परिवार की रोजी-रोटी व दो बड़ी बहनों की शादी के लिए रुपये जुटा रहा है। गरीबी से जंग जीतने की कोशिश में उसका बचपन दम तोड़ चुका है।
मूलरूप से नेपाल व मौजूदा समय में नई आबादी निवासी लक्ष्मण के नौ भाई-बहन हैं, जिनमें से चार बहनें और पांच भाई है। उसके पिता पल्लेदारी का काम करते हैं। स्कूलों के सामने भेलपुरी बेचने वाले लक्ष्मण ने बताया कि उसके चार भाई छोटे हैं तथा एक उससे बड़ा है। वह भी इसी तरह मजदूरी करता है। उसकी दो बहनों की शादी तो हो गई, लेकिन दो अन्य बहनों की शादी अभी बाकी है। उनकी शादी के लिए ही वह भेलपुरी बेचकर रुपये इकट्ठा कर रहा है। लक्ष्मण ने बताया कि उसकी चाहत थी कि वह भी दूसरे बच्चों की तरह स्कूल जाए, लेकिन गरीबी व मजबूरी ने उसकी यह चाहत पूरी नहीं होने दी। आज वह स्कूलों में तो जाता है, लेकिन पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि वहां के बच्चों को भेलपुरी बेचने।
लक्ष्मण ने बताया कि वैसे वह रोजाना 100 रुपये तक कमा लेता है, लेकिन वह किसी के लिए काम करता है, इसलिए उसे एक माह की तनख्वाह 600 रुपये मिलती है। उसने बताया कि वह गरीब होने के कारण अपना सामान नहीं खरीद सकता, इसलिए वह किसी के पास नौकरी करता है। उसे यह कार्य करते करीब छह माह हो गए हैं। शुरू में उसे यह काम मुश्किल भी लगता था, लेकिन अब वह इससे खुश है। हालांकि, बालश्रम कानून के तहत इस मासूम का इस तरह से कार्य करना उचित नहीं है और उसका सही स्थान विद्यालय ही है।

सोमवार, 7 जुलाई 2008

...पहाड़ बना कैनवस

सामने है एक पहाड़ और उस पर चित्रित हैं 120 पक्षी.. 40 फीट से लेकर 120 फीट तक के। चकित हुए न! बात ही कुछ ऐसी है। हम बात कर रहे हैं उस अद्भुत कलाकृति की, जो कुछ ही सालों में आपके सामने होगी। कुछ-कुछ अजंता-एलोरा की गुफाओं की याद ताजा करती इन कलाकृतियों को पश्चिम बंगाल के अयोध्या पहाड़ पर एक कलाकार जीवंत कर रहा है।
कला की यह मिसाल तैयार हो रही है पश्चिम बंगाल के बलरामपुर के पास स्थित अयोध्या हिल्स पर। अपने सपनों को पत्थर पर उकेर रहे इस जुझारू कलाकार का नाम है चित्तो डे। सीआईटी रोड, कोलकाता के रहने वाले चित्तो चूंकि पहाड़ पर 120 पक्षियों की आकृतियां बना रहे हैं, इसलिए पर्वत का नाम अभी से पक्षी पहाड़ पड़ गया है। अब काम सरल तो है नहीं।
चित्तो बताते हैं कि 120 तस्वीरें बनाने में लगभग चार करोड़ रुपये लगने हैं। 600 फीट ऊंचे व 800 फीट चौड़े ग्रेनाइट के पहाड़ पर पक्षियों की आकृति तैयार करने में आठ साल और लगेंगे। लेकिन उन्हें भला पहाड़ पर आकृति बनाने की बात सूझी कैसे? चित्तो कहते हैं, अजंता, एलोरा की गुफाएं देखकर। उन पत्थरों पर खुदी कलाकृतियों को देखकर विचार आया कि क्यों न खुद भी ऐसा ही कुछ किया जाए। लेकिन काम पैसा मांग रहा था, तो चित्तो चले गए केंद्र सरकार के पास। पहले तो केंद्र ने मना कर दिया, मगर जब उन्होंने पहाड़ पर पेंट से डिजाइन तैयार करके दिखाई तो अधिकारी अचंभित रह गए और उन्हें स्वीकृति मिल गई।
चित्तो एक साल से पहाड़ पर पक्षी की डिजाइन बना रहे हैं। अब तक लगभग 250 लीटर पेंट लग चुका है। पहाड़ पर सबसे छोटा पक्षी 40 फीट व सबसे बड़ा 120 फीट का बनेगा और कुल 120 आकृतियां बननी हैं। चित्तो के साथ 30 मजदूर भी लगे हैं। काम मुश्किल है। रस्सी के सहारे पहाड़ पर लटक कर डिजाइन बनानी पड़ती है। चित्तो ने इसके लिए स्पेशल ट्रेनिंग ली। कहते हैं कि एक भी पत्थर में दरार आ गई तो पूरी योजना पर पानी फिर जाएगा।
उनके अनुसार पत्थरों पर आकृतियां बनाने की कला हजारों वर्ष पुरानी है। अजंता-एलोरा, उदयगिरि, महाबलीपुरम व एलीफेंटा गुफाओं की कलाकृतियां भी ऐसी ही हैं। वह कहते हैं कि पहाड़ तैयार हो जायेगा तो पूरे देश में दर्शनीय स्थल होगा और चार किलोमीटर दूर से दिखेगा। चित्तो दा की कल्पना साकार होने में अभी समय है, लेकिन जितना काम हुआ है, वही देखकर लोग दांतों तले अंगुलियां दबा रहे हैं।

गुरुवार, 26 जून 2008

सिगरेट के धुएं में धुंधलाता बचपन

'हर फिक्र को धुएं में उड़ाता चला गया..' ये पंक्तियां गाने के रूप में सुनने में भले ही अच्छी लगती हों, लेकिन स्वास्थ्य के लिए यही धुआं जानलेवा है और यदि बचपन भी इस धुएं की चपेट में आ जाए तो हालात खतरनाक संकेत देते हैं। आज शहर की सड़कों पर खुलेआम 18 वर्ष से कम आयु के बच्चे सिगरेट का धुआं उड़ा रहे हैं। प्रतिबंधित होने के बावजूद बच्चों को आसानी से सिगरेट, बीड़ी व पान-मसाला उपलब्ध हो रहा है। 18 वर्ष से कम आयु के व्यक्ति को सिगरेट पान-मसाला देना प्रतिबंधित है।' ये लाइनें पान-बीड़ी की दुकान, खोखे व सार्वजनिक स्थानों पर लिखी हुई दिखाई देती हैं। शासनादेश भी यही कहता है, लेकिन इनका पालन कहीं नहीं हो रहा। विक्रेता बिना किसी सरोकार के महज अपने जरा से लाभ के लिए बच्चों को सिगरेट, गुटका, पान-मसाला आसानी से बेच रहे हैं। नई पीढ़ी नशे के इस जाल में फंसकर अपने जीवन के मूल उद्देश्य से भटक रही है। इस नशे के आदी हो चुके बच्चे धीरे-धीरे परिवार व समाज से कटते जा रहे हैं। उनका सामाजिक और व्यवहारिक ज्ञान से कोई सरोकार नहीं है।
ऐसे नाबालिगों की बहुत बड़ी जमात बस स्टैंड और पार्को में देखने को मिल जाती है। कई तो इस नशे की दुनिया में इतना आगे निकल चुके हैं कि गुटका व सिगरेट तो महज उनके लिए मामूली नशा है। यदि दिन में एक-आध बार व्हाइट फ्ल्यूड, आयोडेक्स आदि का नशा न कर लें, तो उनकी आंखें ही नहीं खुलतीं। कई तो अपने पूरे बदन पर तेजाब मलकर नशे की तलब को दूर करते हैं। ऐसे कई वाकये प्राइवेट स्कूलों में भी देखने को मिले हैं, जब बच्चों के रुमाल में व्हाइट फ्ल्यूड व आयोडेक्स लगी हुई मिली हैं। कई बार तो बच्चे पुलिस व प्रशासनिक कार्यालयों के सामने ही सिगरेट को धुएं में बदलते दिखाई देते हैं, लेकिन इनको रोकने या समझाने के लिए कोई तैयार नहीं है। नाबालिगों को नशे की इस गर्त में धकेलने के लिए परिवार की अनदेखी सबसे बड़ा कारण है। बच्चों से नशे का सामान मंगवाना और बच्चों के सामने इसका सेवन करना बच्चों पर काफी बुरा प्रभाव डालता है।

शनिवार, 12 अप्रैल 2008

90 लाख रुपये की ब्रा


लगभग 7,000 माणिकों से जड़ी एक ब्रा और उससे मैच करते हुए हार ने यहां शुरू हुए ट्राइंफ अल्टीमेट सपोर्ट एक्जीबिशन में लोगों का मन मोह लिया। इसकी कीमत लगभग दो लाख 27 हजार डालर [लगभग 90 लाख रुपये] है।
समाचार पत्र द स्टार द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार 805 ग्राम वजन वाली इस ब्रा में लगभग 7,256 माणिक टांकने में 250 घंटों का समय लगा। अधोवस्त्र बनाने वाली 122 वर्ष पुरानी कंपनी ट्राइंफ ने इस अवसर पर अपना नया लोगो भी जारी किया।
कंपनी के मार्केटिंग निदेशक लिओ सुन हुआत ने कहा,हमें अपना नया लोगो प्रस्तुत करते हुए गर्व का अनुभव हो रहा है। इसका सहज रूप आधुनिक तस्वीर पेश करता है जो हमारे लिए एक नए युग का सूत्रपात है।

..जहां पिटते हैं देवदास

मर्दो द्वारा महिलाओं की पिटाई के कई समाचार सुनने को मिलते हैं, लेकिन देवास जिले में एक ऐसा गांव भी है जहां गांव भर की महिलाएं बगैर छोटे बड़े का लिहाज किए एक दिन मर्दो की जमकर पिटाई करती हैं और मर्द महिलाओं की मार खाकर स्वयं को सौभाग्यशाली समझते हैं।
देवास जिले के आदिवासी बहुल गांव बोरपड़ाव में नवरात्रि के पांचवें दिन विशेष रूप से मर्दो की पिटाई का होता है। इस दिन गांव के चौक पर माता का प्रसाद रखा जाता है, जिसके आसपास महिलाएं वृक्षों की हरी-हरी टहनियों को लेकर खड़ी रहती हैं, जबकि गांव के मर्द टोलियों में प्रसाद लेने आते हैं और महिलाएं दनादन उनकी पिटाई करतीं हैं। गांव वालों का मानना है इस दिन महिलाओं से पिटना सौभाग्य का प्रतीक है। ऐसा ही नजारा हाल ही में देखने को मिला, जब गांव की महिलाओं ने प्रसाद लेने आए मर्दो की टोली की जमकर पिटाई की। मर्दो की इस पिटाई का नजारा देखने के लिए आसपास के क्षेत्रों की भारी भीड़ इकट्ठा थी।